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ख़ुशी मे बलि!

बात त्योहार की हो या फिर ख़ुशी के मौके की आज बहुतेरे मौकों पर बेहतरीन,ब्रांडेड और लाजबाब गरम मशालों के बीच मुर्गे या बकरी के मांस को उबलते और थाली की शोभा बढ़ाते कहीं भी आसानी से देखा जा सकता है। जी हाँ, यानि हम इन्शान इतने स्वार्थी हैं की अपनी एक छोटी सी ख़ुशी में बेजुबानो की बली बड़ी आसानी से चढ़ा देते है, लेकिन समझ में यह नहीं आता की आखिर उनका दोष क्या रहता है? उन्होंने हम इन्शानों का क्या बिगाड़ रख्खा है? क्या सिर्फ इस लिए की वो बेजुबान हैं या फिर इस लिए की वो जानवर हैं? जो हम कभी भी उनके घर को उजाड़ देने के साथ-साथ उनके बच्चो को अनाथ कर देते है आखिर वो भी तो किसी के माँ-बाप,भाई-बहन,या फिर प्यारे बच्चे होते हैं। आज बाजारों में कही न कहीं केवल पानी को पीकर अपने जीवन को जीने वाली अनेकों प्रजाति के मछलियों के साथ-साथ बकरी और मुर्गे का बोलबाला दिखता है अब तो शहरों में इसके लिए किनारे एक अलग मंडी(बाजार) का स्थान निर्धारित कर दिया जा रहा है जहाँ इन बेजुबानों को बड़ी आसानी से बेजान कर दिया जाता है और अगर गलती से कोई सुद्ध शाकाहारी इनके मंडी के तरफ पहुँच जाये तो कुछ दिनों तक तबियत ख़रा...

अदभुत सम्मोहन

एक यात्रा... दिन के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे सूर्यदेव की मानो कमजोर हो चुकी किरणें अगले दिन एक बार फिर से मिलने के वादे के साथ विदा लेते हुए सबके दर्शन को आतुर चन्द्रमा का स्वागत करने को बेताब दिख रही थीं कि अचानक ट्रेन के रुकने का एहसास हुआ और प्लेटफार्म की गूंजती आवाज कानों में दस्तक देनें लगी। जगह जानने की उत्सुकता जागी और नजरें चारो तरफ तैरने लगीं, लेकिन अफसोस कि दूर-दूर तक प्लेटफार्म पर नेम प्लेट नजर नहीं आया, इसलिए स्थान स्पष्ट नहीं हो सका कि हम कहां पर हैं। खैर कुछ देर भी नहीं बीते होंगे कि ट्रेन के पहिए घूमने लगे और मैं जगह जानने की उत्सुक्ता लिए प्लेटफार्म की ओर खिड़की के बगल में बैठे परिवार से पूछ बैठा कि अभी कौन सा स्टेशन निकला है और इस समय हम कहां पर हैं?  दूसरी ओर से चंद पलों के बाद कमजोर हो चुकी आवाज में दम भरने का एहशास कराती मानो मिर्ची का तड़का लगा हो कुछ ऐसे ही अंदाज में एक आवाज मेरे कानों तक पहुंची मानिकपुर। यह लड़खड़ाती लेकिन कड़क आवाज दरअसल उस बूढ़ी मां की थी जो एक महिला शायद उनकी बहु हो तथा एक ऐसे नटखट लगभग दो वर्ष के बच्चे शायद उनका पोता हो के साथ सफर कर...

तोहफा

रक्षा बंधन.................। चारो तरफ फुटपाथ से लेकर बड़े-बड़े दुकानों तक अनेको रंग बिरंगी राखियों का कब्ज़ा। आलम यह कि कहीं तख़्त पर पड़े बड़े-बड़े छतरी तो कहीं रस्सियों से लटके मनमोहक रंगों में रेशम के धागे जो खुद ही लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर सबको बता देते हैं कि भाई बहन का त्यौहार बिलकुल करीब है। ऐसे मौके पर जहां एक तरफ सड़कों के किनारे अनेकों दुकानों से लेकर बड़े-बड़े मॉल भी इस त्यौहार में लोगों को अपनी तरफ रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते तो दूसरी तरफ मिठाईयों कि दुकानों को हर कोई खगालने में ही ब्यस्त होता है। आखिर ऐसा हो भी क्यों न यही तो वो पवित्र त्यौहार होता है जो भाई-बहन के रिश्ते को और मजबूत करता है और साथ ही इसी बहाने भाई को एक और मौका मिलता है अपनी लाडली या फिर बड़ी बहन को कुछ तोहफा देने का.............................। दरअसल ये सारी बाते कैंसर के जाल में फंसे अर्जुन के दिमाग में घंटों से चक्कर लगाये जा रही थी। कमरे में पड़ी टूटी चारपाई जिसने एक झूले का स्वरुप ले रख्खा था पर लेटा अर्जुन हाथ को अपने सिर पर रख्खे दोनों आँखों को सीधे छत की ओर एक टक लगाये इस क़द्र...

...और पूरी रात जगता रहा

तेज़ रफ़्तार से चल रही जीवन रूपी गाड़ी में से दस मिनट का समय निकाल पाना आसान होते हुए भी काफी मुश्किल सा नज़र आता है। वही पुरानी घिसी पिटी रोज की दिनचर्या...............सुबह-सुबह गायत्री मंत्र वाले अलार्म टोन के साथ एक खूबसूरत दिन की चाहत में आँखों का खुलना, जल्दी-जल्दी महत्वपूर्ण आवश्यक्ताओं को पूरा करते हुए समय से पांच मिनट पहले पहुचने का टार्गेट लिए निर्धारित समय पर ही आफिस में घुसना और फिर एक गिलास सादे पानी के साथ जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अपने कार्य में लग जाना। कार्य के दौरान कभी बोस की सुनना तो कभी झल्लाए दिमाग से जूनियरों को सुनाना, फिर शाम को जल्दी घर पहुँचाने की मन में लालसा लिए लेट हो जाना और रात में देर से सोना..............। रविवार का दिन होने के कारण देर तक बिस्तर पर लेटे रवि के दिमाग में ये सारी बातें काफी देर से घूम रहीं थी। मन उबा तो सोचा कि क्यों न दो चार दिन की छुट्टी लेकर कहीं घूम आने का प्रोग्राम बनाया जाय। दिमाग और मन के साथ काफी मशक्कत करने और फिर बाद में दोनों को मनाते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि क्यों न शिवानंद के घर ही चलूँ, खर्च भी कम होगा ...

सबका मशीहा बन चुका………………!

धरती पे शायद कुछ भी ऐसा नहीं जिस पर ऊँगली न उठाई जा सके लेकिन प्रतिसत में अंतर जरुर देखा और किया जा सकता है ऐसे में आज सबके जीवन में एक अभिन्न रूप धारण करती देश की मिडिया को भी तो लोग कई नज़रों से देखते ही है कुछ इसको सौ प्रतिशत से भी ऊपर श्रेणी में रखते है तो कुछ के नजर में ये प्वाईंट जीरो से भी कम………. लेकिन फिर भी कोई न कोई बात तो है ही की आज इसने सबके बिच एक जबरदस्त तरीके से अपनी प्रस्तुती की है और आज सबकी समस्याओ की घडी में मदद करने वाले एक मशीहा के रूप में उभरा कर हर समस्याओं के सामने खड़ा है जी हाँ देश के कुछ ही इलाके जो जरुरत से ज्यादा ही पिछड़े हैं यानि वंहा पर जीवन यापन करने वाले लोग जो किसी भी आधुनिक चीजो से कोसो दूर हैं को छोड़ कर आज शायद ही कोई ब्यक्ति ऐसा होगा जो इस शब्द यानि मिडिया से अपरचित हो,अब ऐसे में चाहे इसका कोई भी रूप हो(प्रिंट,इलेक्ट्रोनिक या वेब)हर छेत्रों में अपना ब्यापक विस्तार करते हुए देश की सेवा के लिए हमेशा ही आगे बढ़ कर कम किया है इसने! जी हाँ रोती आँखों को पोंछने की ललक वो चाहे किसी भी वर्ग की आँख हो, देश में घटित हो रहे अनेकों प्रकार की घटनाये चाहे वो र...

पहले चलना तो सीखो बहन की तरह……………..

शाम की सुहानी हवा से मन में शांति पाने के लिए गेट के बाहर वाली चाय की छोटी सी दुकान पर जैसे ही पहुंचा और अभी दुकानदार को चाय के लिए बोलते हुए जैसे ही बैठने की कोशिश कर ही रहा था की अचानक ही रोड पर एक तेज़ रफ़्तार से बाइक जाने की आवाज़ सुनाई पड़ी मैंने मुड कर तुरंत देखा की वो बइक किसी स्कूटी का पीछा कर रही थी और कुछ दूर आगे जाने पर दोनों गाड़ियाँ रुक गई फिर कुछ तेज़ आवाज़ में बात होने लगी अब आवाज़ सुन आस पास के तथा आने जाने वाले लोग इक्कठा होने लगे अब चूकी लड़की और लड़कों की बात थी तो मेरे साथ कुछ और लोग जो दुकान पर बैठे थे हम सब आगे उधर की ओर बढे! तब तक गंगाराम का मोबाइल बजा और वो किसी से बात करने लगा, क्या सोच रहे है गंगाराम कौन है अरे ये तो मेरा बहुत ही पुराना मित्र है और कल अचानक ही बहुत दिनों के बाद मिल गया फिर हमलोग बगल में एक चाय की दुकान पर बैठ कर चाय की चुस्की लेने के साथ-साथ एक दुसरे का हाल चाल पूछने लगे! गंगाराम के हाथ में अख़बार था जिसमे एक न्यूज़ पर गंगाराम अचानक ही हँसते हुए ये कहानी मुझसे कहने लगा था! अब चुकी कहानी अभी अधूरी थी तो फोने रखते ही मैंने उससे कहा की हाँ गं...

अब खाले बेटी...

फोन के घंटी की आवाज़ सुनते ही सुबह से इंतजार कर रही रुक्मिणी के अन्दर अचानक जोश आ गया और दौड़ती हुई फोन रिसीवर को उठा कान में लगाते ही बोल पड़ी भैया कैसे हो मेरी राखी आपने बांधी की नहीं,आपको पता है की ये आपकी बहन आपके फोन का ही इंतजार कर रही थी पहले ये बताओ आपने कुछ खाया की नहीं मुझे भी बहुत जोर की भूख लगी है भैया और पता नहीं क्या क्या बिना साँस लिए बोलते हुए उदास हुई रुक्मिणी काफी खुश दिख रही थी की अचानक ही उसकी आवाज़ रुक गई……………दर असल फोन कम्पनी से आपरेटर का था जो बकाये बिल की याद दिलाने के लिये किया था! रिसीवर रख दुबारा उदासी से दोस्ती करते हुए रुक्मिणी बैठका में उस टेबल के बगल में जा कर बैठ गई जिस पर उसके इंजीनियर भाई प्रमोद की फोटो रखी थी तथा हँसते हुए प्रमोद के फोटो को देख अचानक सारा गुस्सा उतारते हुए बोल पड़ी आज मै भी देखती हूँ की आप मुझे याद करते हो की नहीं और हाँ एक बात और सुन लो चाहे सूरज पूरब के बजाय पश्चिम से क्यों न उगे खाना तो तभी खाऊँगी ज़ब तक हर साल की तरह आप मुझसे पूछ नहीं लेते! इतने में उसकी पुराणी और प्रिय दोस्त अपने नये मोबाइल जो उसके भाई श्याम ने उसे १२ वी म...