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इंसान निर्जीव है!

इंसान एक जीव है और कोई भी जीव सजीव होता है- ऐसा इसलिए क्योंकि वह चल सकता है, बोल सकता है, सोच सकता है और कुछ भी कर सकता है। ऐसा बचपन से सुनता आया हूँ। अबतक के जीवन यात्रा में जितने भी लोगों से साक्षत्कार हुआ और जिसके पास जितना अधिक ज्ञान मार्ग हैं, सभी ने अपनी पकड़ के अनुसार उस पर चलाते हुए यह बताने और समझाने में कहीं कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी कि जीव चाहे किसी भी रूप में हो वह सजीव ही होता है। आज भी अनेकों विद्वान अपने ज्ञानदीप से यह उजाला करने की लगातार कोशिश में लगे रहते हैं कि जीव के अनेक रूप हैं और सभी रूपों में वह सजीव ही होता है। ऐसे में यह कहना शायद गलत हो परंतु, पता नहीं क्यों दिमाग का एक छोटा सा कोना तमाम ज्ञानार्जन के बाद भी इस नतीजे पर नहीं पहुंच पा रहा कि जीव सजीव होता है, ऐसा वह मानने को तैयार ही नहीं। बार-बार उसे समझाने पर भी उसे यही लग रहा है कि जीव  तो सजीव है ही नहीं। हकीकत में यह भी निर्जीव है जैसे कमरे में रखी एक कुर्सी। और जिस प्रकार उस कुर्सी के सजीव होने का कोई सवाल नहीं, ठीक उसी प्रकार किसी भी जीव चाहे वह किसी भी रूप में हो उसके सजीव होने का भी कोई सवाल पैदा न...

तैंतीस कितने को कहते हैं...? (वर्तमान में हिंदी और हम)

वर्ष में एक बार हिंदी की याद और इसके लिए थोडा समय आखिर में हम सभी निकाल ही लेते हैं। दरअसल इस दिन इसकी चिंता में कहीं किसी मंच पर होते हैं कुछ वादे, तो कहीं किसी मंच से दे दी जाती हैं कुछ नसीहतें। और फिर। फिर क्या? फिर अगले वर्ष की इसके लिए निर्धारित तारिख के इंतजार में हम सभी मशगूल हो जाते हैं। ऐसे में मुझे एक घटना याद आती है जो हिंदी की वर्तमान दशा से परिचय कराती है। बात ज्यादा पुरानी नहीं है जब मुझे एक प्राइवेट विद्यालय के वार्षिक कार्यक्रम में जाने का अवसर मिला था। विद्यालय इंग्लिश मीडियम जो एक गांव में स्थित है, शायद वहां अधिकाधिक आने जाने वाले हिंदी को ही समझते हों। समारोह में बैठे लगभग ज्यादातर लोग भी सम्भवतः ऐसे ही थे जो सिर्फ हिंदी ही जानते थे। कार्यक्रम चल रहा था एक एक कर अतिथिगण अपनी विद्वता का परिचय देते हुए उपस्थित लोगों और बच्चों को कुछ न कुछ सीख दिए जा रहे थे। एक प्रोफ़ेसर साहब जो डिग्री कालेज में इंग्लिश के हेड थे, उनकी भी वहां उपस्थित थी। कुछ देर बाद माईक से निकली मधुर आवाज़ ने उनको भी माईक की ओर आमंत्रित किया। पिछले सभी वक्ताओं की तरह उन्होंने भी अपना भाषण शुद्ध हि...

ख़ुशी मे बलि!

बात त्योहार की हो या फिर ख़ुशी के मौके की आज बहुतेरे मौकों पर बेहतरीन,ब्रांडेड और लाजबाब गरम मशालों के बीच मुर्गे या बकरी के मांस को उबलते और थाली की शोभा बढ़ाते कहीं भी आसानी से देखा जा सकता है। जी हाँ, यानि हम इन्शान इतने स्वार्थी हैं की अपनी एक छोटी सी ख़ुशी में बेजुबानो की बली बड़ी आसानी से चढ़ा देते है, लेकिन समझ में यह नहीं आता की आखिर उनका दोष क्या रहता है? उन्होंने हम इन्शानों का क्या बिगाड़ रख्खा है? क्या सिर्फ इस लिए की वो बेजुबान हैं या फिर इस लिए की वो जानवर हैं? जो हम कभी भी उनके घर को उजाड़ देने के साथ-साथ उनके बच्चो को अनाथ कर देते है आखिर वो भी तो किसी के माँ-बाप,भाई-बहन,या फिर प्यारे बच्चे होते हैं। आज बाजारों में कही न कहीं केवल पानी को पीकर अपने जीवन को जीने वाली अनेकों प्रजाति के मछलियों के साथ-साथ बकरी और मुर्गे का बोलबाला दिखता है अब तो शहरों में इसके लिए किनारे एक अलग मंडी(बाजार) का स्थान निर्धारित कर दिया जा रहा है जहाँ इन बेजुबानों को बड़ी आसानी से बेजान कर दिया जाता है और अगर गलती से कोई सुद्ध शाकाहारी इनके मंडी के तरफ पहुँच जाये तो कुछ दिनों तक तबियत ख़रा...

अदभुत सम्मोहन

एक यात्रा... दिन के अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहे सूर्यदेव की मानो कमजोर हो चुकी किरणें अगले दिन एक बार फिर से मिलने के वादे के साथ विदा लेते हुए सबके दर्शन को आतुर चन्द्रमा का स्वागत करने को बेताब दिख रही थीं कि अचानक ट्रेन के रुकने का एहसास हुआ और प्लेटफार्म की गूंजती आवाज कानों में दस्तक देनें लगी। जगह जानने की उत्सुकता जागी और नजरें चारो तरफ तैरने लगीं, लेकिन अफसोस कि दूर-दूर तक प्लेटफार्म पर नेम प्लेट नजर नहीं आया, इसलिए स्थान स्पष्ट नहीं हो सका कि हम कहां पर हैं। खैर कुछ देर भी नहीं बीते होंगे कि ट्रेन के पहिए घूमने लगे और मैं जगह जानने की उत्सुक्ता लिए प्लेटफार्म की ओर खिड़की के बगल में बैठे परिवार से पूछ बैठा कि अभी कौन सा स्टेशन निकला है और इस समय हम कहां पर हैं?  दूसरी ओर से चंद पलों के बाद कमजोर हो चुकी आवाज में दम भरने का एहशास कराती मानो मिर्ची का तड़का लगा हो कुछ ऐसे ही अंदाज में एक आवाज मेरे कानों तक पहुंची मानिकपुर। यह लड़खड़ाती लेकिन कड़क आवाज दरअसल उस बूढ़ी मां की थी जो एक महिला शायद उनकी बहु हो तथा एक ऐसे नटखट लगभग दो वर्ष के बच्चे शायद उनका पोता हो के साथ सफर कर...

तोहफा

रक्षा बंधन.................। चारो तरफ फुटपाथ से लेकर बड़े-बड़े दुकानों तक अनेको रंग बिरंगी राखियों का कब्ज़ा। आलम यह कि कहीं तख़्त पर पड़े बड़े-बड़े छतरी तो कहीं रस्सियों से लटके मनमोहक रंगों में रेशम के धागे जो खुद ही लोगों को अपनी तरफ आकर्षित कर सबको बता देते हैं कि भाई बहन का त्यौहार बिलकुल करीब है। ऐसे मौके पर जहां एक तरफ सड़कों के किनारे अनेकों दुकानों से लेकर बड़े-बड़े मॉल भी इस त्यौहार में लोगों को अपनी तरफ रिझाने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते तो दूसरी तरफ मिठाईयों कि दुकानों को हर कोई खगालने में ही ब्यस्त होता है। आखिर ऐसा हो भी क्यों न यही तो वो पवित्र त्यौहार होता है जो भाई-बहन के रिश्ते को और मजबूत करता है और साथ ही इसी बहाने भाई को एक और मौका मिलता है अपनी लाडली या फिर बड़ी बहन को कुछ तोहफा देने का.............................। दरअसल ये सारी बाते कैंसर के जाल में फंसे अर्जुन के दिमाग में घंटों से चक्कर लगाये जा रही थी। कमरे में पड़ी टूटी चारपाई जिसने एक झूले का स्वरुप ले रख्खा था पर लेटा अर्जुन हाथ को अपने सिर पर रख्खे दोनों आँखों को सीधे छत की ओर एक टक लगाये इस क़द्र...

...और पूरी रात जगता रहा

तेज़ रफ़्तार से चल रही जीवन रूपी गाड़ी में से दस मिनट का समय निकाल पाना आसान होते हुए भी काफी मुश्किल सा नज़र आता है। वही पुरानी घिसी पिटी रोज की दिनचर्या...............सुबह-सुबह गायत्री मंत्र वाले अलार्म टोन के साथ एक खूबसूरत दिन की चाहत में आँखों का खुलना, जल्दी-जल्दी महत्वपूर्ण आवश्यक्ताओं को पूरा करते हुए समय से पांच मिनट पहले पहुचने का टार्गेट लिए निर्धारित समय पर ही आफिस में घुसना और फिर एक गिलास सादे पानी के साथ जिम्मेदारियों को पूरा करने के लिए अपने कार्य में लग जाना। कार्य के दौरान कभी बोस की सुनना तो कभी झल्लाए दिमाग से जूनियरों को सुनाना, फिर शाम को जल्दी घर पहुँचाने की मन में लालसा लिए लेट हो जाना और रात में देर से सोना..............। रविवार का दिन होने के कारण देर तक बिस्तर पर लेटे रवि के दिमाग में ये सारी बातें काफी देर से घूम रहीं थी। मन उबा तो सोचा कि क्यों न दो चार दिन की छुट्टी लेकर कहीं घूम आने का प्रोग्राम बनाया जाय। दिमाग और मन के साथ काफी मशक्कत करने और फिर बाद में दोनों को मनाते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि क्यों न शिवानंद के घर ही चलूँ, खर्च भी कम होगा ...

सबका मशीहा बन चुका………………!

धरती पे शायद कुछ भी ऐसा नहीं जिस पर ऊँगली न उठाई जा सके लेकिन प्रतिसत में अंतर जरुर देखा और किया जा सकता है ऐसे में आज सबके जीवन में एक अभिन्न रूप धारण करती देश की मिडिया को भी तो लोग कई नज़रों से देखते ही है कुछ इसको सौ प्रतिशत से भी ऊपर श्रेणी में रखते है तो कुछ के नजर में ये प्वाईंट जीरो से भी कम………. लेकिन फिर भी कोई न कोई बात तो है ही की आज इसने सबके बिच एक जबरदस्त तरीके से अपनी प्रस्तुती की है और आज सबकी समस्याओ की घडी में मदद करने वाले एक मशीहा के रूप में उभरा कर हर समस्याओं के सामने खड़ा है जी हाँ देश के कुछ ही इलाके जो जरुरत से ज्यादा ही पिछड़े हैं यानि वंहा पर जीवन यापन करने वाले लोग जो किसी भी आधुनिक चीजो से कोसो दूर हैं को छोड़ कर आज शायद ही कोई ब्यक्ति ऐसा होगा जो इस शब्द यानि मिडिया से अपरचित हो,अब ऐसे में चाहे इसका कोई भी रूप हो(प्रिंट,इलेक्ट्रोनिक या वेब)हर छेत्रों में अपना ब्यापक विस्तार करते हुए देश की सेवा के लिए हमेशा ही आगे बढ़ कर कम किया है इसने! जी हाँ रोती आँखों को पोंछने की ललक वो चाहे किसी भी वर्ग की आँख हो, देश में घटित हो रहे अनेकों प्रकार की घटनाये चाहे वो र...